सनातन धर्म में पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए गया जी (Gaya Ji) को सबसे पवित्र और सर्वोत्तम स्थान माना गया है। हर साल लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से अपने पूर्वजों का पिंडदान करने गया धाम आते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गया जी में ही पिंडदान क्यों किया जाता है? इसके पीछे क्या पौराणिक कथा और महत्व है? आइए विस्तार से जानते हैं।
गयासुर राक्षस की पौराणिक कथा
वायु पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में गयासुर नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर (राक्षस) था। उसने कठिन तपस्या करके भगवान ब्रह्मा से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि जो कोई भी उसे देख लेगा या स्पर्श कर लेगा, उसे सीधे स्वर्ग (मोक्ष) की प्राप्ति होगी।
इस वरदान के कारण पापी से पापी व्यक्ति भी बिना किसी धर्म-कर्म के सीधे स्वर्ग जाने लगे, जिससे सृष्टि का नियम बिगड़ने लगा। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान विष्णु ने गयासुर से उसकी पवित्र पीठ पर यज्ञ करने के लिए स्थान मांगा। गयासुर सहर्ष तैयार हो गया और लेट गया।
भगवान विष्णु के चरण चिह्न (Vishnupad Footprints)
जब गयासुर लेटा, तो भगवान विष्णु ने उसके ऊपर अपना पैर रख दिया जिससे वह स्थिर हो गया। भगवान विष्णु के पैर के निशान शिला पर छप गए, जिसे आज हम विष्णुपद मंदिर (Vishnupad Temple) के नाम से जानते हैं। गयासुर की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि जो कोई भी यहां आकर पितरों के निमित्त पिंडदान और श्राद्ध करेगा, उसके पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलेगी और सीधे मोक्ष (salvation) प्राप्त होगा।
श्रीमद्भागवत और रामायण में संदर्भ
त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने स्वयं गया जी आकर फल्गु नदी के तट पर महाराज दशरथ का पिंडदान किया था, जिसका साक्षी माता सीता द्वारा बालू से बनाया गया पिंड था। गया जी में पिंडदान करने से पितर तृप्त होकर अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद देते हैं।